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केंद्रीय जल आयोग

(1945 से राष्ट्र की सेवा में)

बच्चों के लिए सूचना

प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न

  1. जल क्या है ?
  2. पृथ्वी पर कितना जल है ?
  3. समुद्र का जल नमकीन क्यों होता है ?
  4. जल-विज्ञान चक्र अथवा जल चक्र क्या है ?
  5. जल-प्रदूषण क्या होता है ?
  6. जल-प्रदूषण के क्या दूषप्रभाव होते हैं ?
  7. जल-संरक्षण किसे कहते हैं ?
  8. हम जल का संरक्षण कैसे कर सकते है ?
  9. बाँध क्या होता है ?
  10. हमें बांधों की आवश्यकता क्यों होती है ?
  11. बाँध कितने प्रकार के होते हैं ?
  12. जल विद्युत क्या है ?
  13. जल विद्युत शक्ति कैसे बनाई जाती है ?
  14. बाढ क्या है ?
  15. अक़ाल/सूखा क्या है ?

जल क्या है ??

जल ही जीवन है । आप भोजन के बिना एक माह से अधिक जीवित रह सकते हो, परन्तु जल के बिना आप एक सप्ताह से अधिक जीवित नहीं रह सकते । कुछ जीवों (जैसे जैली फिश) में उनका 90 प्रतिशत से अधिक शरीर का भार जल से होता है । मानव शरीर में लगभग 60 प्रतिशत जल होता है - मस्तिष्क में 85 प्रतिशत जल है, रक्त में 79 प्रतिशत जल है तथा फेफड़ों में लगभग 80 प्रतिशत जल होता है ।
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पृथ्वी पर कितना जल है ?

  • पृथ्वी की सतह लगभग 75 प्रतिशत जल से भरी है । परन्तु इसका 97 प्रतिशत समुद्रों में है तथा पृथ्वी का केवल 3 प्रतिशत जल ही पीने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है । तथापि, इसका अधिकतर हिस्सा या तो धुवीय हिम टोप के रूप में जम जाता है या मृदा में मिल जाता है । अतः हमारे द्वारा उपयोग्य जल पृथ्वी के सतही जल की कुल मात्रा का केवल 0.5 प्रतिशत है ।
  • पृथ्वी गृह की कुल जल आपूर्ति 1335 मिलि क्यू. कि.मी. है । सामान्यतः इसका अर्थ है कि अगर हम 1 कि.मी. की लम्बाई, चौड़ाई तथा ऊचाई का एक घनाकृति का बक्सा बनाँए, तो हमें समस्त जल का भंडारण करने के लिए ऐसे 1335000000 बक्सों की आवश्यकता होगी । यह आश्चर्यजनक है कि नहीं ?
  • एक समय में वातावरण में लगभग 13000 घन कि.मी. जल होता है जो अधिकांशतः जल वाष्प् के रूप में होता है । अगर यह एक ही वार में सारा नीचे गिर जाए तो पृथ्वी केवल 25 मि.मी. जल से ढक जाएगी ।
  • प्रत्येक दिन वातावरण में 1150 घन कि.मी. जल का वाष्पीकरण अथवा वाष्पोत्सर्जन होता है ।
  • पृथ्वी पर अधिकतर मीठा जल झीलों तथा नदियों की अपेक्षा भूमि से प्राप्त होता है । भूमि में मीठे जल के भण्डारण की मात्रा झीलों, अंतदेर्शीय समुद्रों तथा नदियों में इसकी मात्रा 150,000 घन कि.मी. से अधिक 800,000 घन कि.मी. है । अधिकांश भू-जल पृथ्वी की सतह से एक कि.मी. के भीतर होता है ।
  • ग्लेशियर तथा हिम-टोपो में लगभग 18000,000 घन कि.मी. जल पाया जाता है जो मुख्यतः ध्रुवीय क्षेत्रों तथा हरीभूमि में उपलब्ध होता है ।
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समुद्र का जल नमकीन क्यों होता है ?

वर्षा जल भूमि में गिरने पर वायुमंडल में फैले कार्बन डाइ आक्साईड के सम्पर्क में आने के कारण कुछ अम्लीय हो जाती है । अम्ल पृथ्वी की चट्टानों का कटाव एवं भेदन करता है तथा इनके टूटे हुए हिस्सों को आयनों के रूप में अपने साथ बहाकर ले जाता है । आयन नहरों तथा नदियों के रास्ते समुद्र में चले जाते हैं । जबकि कई विघटित आयन जीवों द्वारा उपयोग किए जाते हैं तथा अन्य लम्बे समय के लिए छोड़ दिए जाते हैं, जहाँ समय के साथ-साथ इनकी मात्रा भी बढ़ती रहती हैं । समुद्री जल में क्लराईड तथा सोडियम होता है जिससे समद्र जल के विघटित आयनों का 90 प्रतिशत से अधिक की प्रतिपूर्ति हो जाती है । समुद्र जल में कुल विघटित नमक का लगभग 3.5 प्रतिशत है । इससे समद्र का जल नमकीन होता है ।
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जल-चक्र छवि

जल-चक्र क्या है ?

जल की एक मुख्य विशेषता यह है कि यह अपनी अवस्था आसानी से बदल सकता  है । यह ग्रह पर अपनी तीन अवस्थाओं, ठोस, द्रव तथा गैस के रूप में आसानी से प्राप्त हो जाता है । पृथ्वी पर जल की मात्रा सीमित है । जल का चक्र अपनी स्थिति बदलते हुए चलता रहता है जिसे हम जल चक्र अथवा जलविज्ञानीय चक्र कहते हैं । जलीय चक्र की प्रक्रिया जल-मंडल, एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ वातावरण तथा पृथ्वी की सतह का सारा जल मौजूद होता है । इस जलमंडल में जल की गति ही जल चक्र कहलाता है । यह संपूर्ण प्रक्रिया बहुत ही सरल है जिसे चित्र में 6 भागों में विभाजित किया गया है।
क - वाष्पीकरण/वाष्पोत्सर्जन
ख - द्रवण
ग - वर्षण
घ -  अंतः-स्यंदन
ड -  अपवाह

च - संग्रहण

जब वातावरण में जल वाष्प् द्रवित होकर बादलों का निर्माण करते है, इस प्रक्रिया को द्रवण कहते हैं । जब वायु काफी ठण्डी होती है तब जल वाष्प् वायु के कणों पर द्रवित होकर बादलों का निर्माण करता है । जब बादल बनते हैं तब वायु विश्व में चारो ओर ले जाकर जल वाष्प् को फैलाती है । अन्ततः बादल आद्रता को रोक नहीं पाते तथा वे हिम, वर्षा, ओले आदि के रूप में गिरते हैं ।

    अगले तीन चरण - अंतःस्यंदन, अपवाह तथा वाष्पीकरण एक साथ होते हैं । अंतःस्यंदन की प्रक्रिया वर्षा के भूमि में रिसाव के कारण होती है । यदि वर्षा तेजी से होती है तो इससे भूमि पर अंतः स्यंदन की प्रक्रिया हो कर अपवाह हो जाता है । अपवाह जल स्तर पर होता है तथा नहरों, नदियों में प्रवाहित होते हुए बड़ी जल निकायों जैसे झीलों अथवा समुद्र में चला जाता है । अंतस्यांदित भू-जल भी इसी तरह प्रवाहित होता है क्योंकि यह नदियों का पुनर्भरण करता है तथा जल की बड़ी निकायों की ओर प्रवाहित हो जाता है । सूर्य की गर्मी से जल का वाष्पों में बदलने को वाष्पीकरण कहते है । सूर्य की रोशनी समुद्र तथा झीलों के जल को गर्म करती है तथा गैस में परिवर्तित करती है । गर्म वायु वातावरण में ऊपर उठकर द्रवण की प्रक्रिया से वाष्प् बन जाती है ।

    जलीय चक्र निरंतर चलता है तथा स्रोतों को स्वच्छ रखता है । पृथ्वी पर इस प्रक्रिया के अभाव में जीवन असंभव हो जाएगा ।
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जल प्रदूषण क्या है ?

जब झीलों, नहरों, नदियों, समुद्र तथा अन्य जल निकायों में विषैले पदार्थ प्रवेश करते हैं और यह इनमें घुल जाते है अथवा पानी में पड़े रहते हैं या नीचे इकट्ठे हो जाते हैं । जिसके परिणामस्वरूप जल प्रदूषित हो जाता है और इससे जल की गुणवत्ता में कमी आ जाती है तथा जलीय पारिस्थितिकी प्रणाली प्रभावित होती है । प्रदूषकों का भूमि में रिसन भी हो सकता है जिससेकत्र भूमि-जल भी प्रभावित होता है । जल प्रदूषण के मुख्य स्रोत निम्नलिखित है:

  • घरेलू सीवेज :- जैसे- घरों से छोड़ा गया अपशिष्ट जल तथा सफाई सीवेज वाला जल
  • कृषिअपवाह :- जैसे- कृषि क्षेत्रों का भू-जल जहाँ रासायनिक उर्वरकों का अंधाधुंध प्रयोग हुआ हो ।
  • औद्योगिकबहस्राव :- जैसे- उद्योगों में विनिर्माण कार्यों अथा रासायनिक प्रक्रियाओं का अपशिष्ट जल ।

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जल प्रदूषण के प्रभाव

जल प्रदूषण से व्यक्ति ही नहीं अपितु पशु-पक्षी एवं मछली भी प्रभावित होते हैं । प्रदूषित जल पीने, पुनःसृजन कृषि तथा उद्योगों आदि के लिए भी उपयुक्त नहीं हैं । यह झीलों एवं नदियों की सुन्दरता को कम करता है । संदूषित जल, जलीय जीवन को समाप्त करता है तथा इसकी प्रजनन - शक्ति को क्षीण करता है ।
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जल प्रदूषण का स्वास्थ्य पर प्रभावः

जलजनित रोग संक्रामक रोग होते हैं जो मुख्यतः संदूषित जल से फैलते हैं । हिपेटाईटिस, हैजा, पेचिश तथा टाइफाईड आम जलजनित रोग है, जिनसे उष्णकटिबंधीय क्षेत्र के बहुसंख्यक लोग प्रभावित होते हैं । प्रदूषित जल के संपर्क से अतिसार, त्वचा संबंधी रोग, श्वास समस्यांए तथा अन्य रोग हो सकते है जो जल निकायों में मौजूद प्रदूषकों के कारण होते है । जल के स्थिर तथा अनुपचारित होने से मच्छर तथा अन्य कई परजीवी कीट आदि उत्पन्न होते है जो विशेषतः उष्णकटिबंधिय क्षेत्रों में कई बिमारियाँ फैलाते हैं ।
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जल संरक्षण

वर्षों से बढती जनसंख्या, औद्योगिकीकरण में वृद्धि तथा कृषि में विस्तार होने से जल की मांग बढती जा रही है । अतएव जल संरक्षण आज की आवश्यकता बन गई है । वर्षा जल संचयन मूल्यतः भवनों की छतों पर इकट्ठा करके भूमि में संरक्षण करके आगे काम में लेने की प्रक्रिया है । इसके लिए यह अत्यावश्यक है कि भू-जल की गिरावट तथा भू-जल स्तर में सुधार किया जाए तथा समुद्र के जल का अंतर्गमन अर्थात समुद्री जल को भूमि की तरफ आने से रोका जाए और वर्षा मौसम के दौरान सतही जल का अपवाह तथा शहरी अपशिष्ट जल का संरक्षण किया जाए ।
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जल संरक्षण के लिए आप क्या कर सकते है ?

  • -यह  जांच करें कि आपके घर में पानी का रिसाव न हो ।
  • -आपको जितनी आवश्यकता हो उतने ही जल का उपयोग करें ।
  • -पानी के नलों को इस्तेमाल करने के बाद बंद रखें ।
  • -मंजन करते समय नल को बंद रखें तथा आवश्यकता होने पर ही खोलें ।
  • -नहाने के लिए अधिक जल को व्यर्थ न करें ।
  • -ऐसी वाशिंग मशीन का इस्तेमाल करें जिससे अधिक जल की खपत न हो ।
  • -खाद्य सामग्री तथा कपड़ों को धोते समय नलो का खुला न छोड़े ।
  • -जल को कदापि नाली में न बहाएं बल्कि इसे अन्य उपयोगों जैसे - पौधों अथवा बगीचे को सींचने अथवा सफाई इत्यादि में लाए ।
  • -सब्जियों तथा फलों को धोने में उपयोग किए गए जल को फूलों तथा सजावटी पौधों के गमलों को सींचने में किया जा सकता है ।
  • -पानी की बोतल में अंततः बचे हुए जल को फेंके नही अपतु इसका पौधों को सींचने में उपयोग करें ।
  • -पानी के हौज को खुला न छोड़ें ।
  • -तालाबों, नदियों अथवा समुद्र में कूड़ा न फेंक

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बांध तथा पनबिजली

बांध क्या होता है ?

बांध नहर अथवा नदी पर जल के प्रवाह को रोकने का एक अवरोध है तथा इसको कई प्रयोजनों के लिए उपयोग किया जा सकता है । बांध लघु, मध्यम तथा बड़े हो सकते है । बड़े बांधों का निर्माण करना अधिक जटिल होता है जिससे अत्यधिक कार्य, शक्ति, समय तथा धन खर्च होता है । बांध का निर्माण कंक्रीट, चट्टानों, लकड़ी अथवा मिट्टी से भी किया जा सकता है । भाखड़ा बांध, सरदार सरोवर, टीहरी बांध इत्यादि बड़े बांधों के उदाहारण है । परियोजनाओं के बारे में अधिक जानकारी के लिए हमारे वेवसाईट को देखें । एक बांध की इसके पीछे के पानी के भार को वहन करने की क्षमता अतिआवश्यक होती है । बांध पर धकेले जाने वाली जल की मात्रा को जल-दाब कहते है । जल-दाब जल की गहराई के साथ बढ़ता है । इसके परिणामस्वरूप कई बांधों का तल चौडा होता है जिससे यह सतह के काफी नीचे बहुभागा में बहने वाले जल का भार वहन कर सकें । ऊपर जाएँ

हमें बांधों की आवश्यकता क्यों होती है ?

बांधों का उपयोग सिंचाई, पीने का पानी, बिजली बनाने तथा पुनः सृजन के लिए जल के भण्डारण में होता है । बांधों से बाढ़ नियंत्रण में भी सहायता मिलती है । आप बांध के जलाशय से पीने का पानी प्राप्त कर सकते हैं अथवा बांध के जलाशय के जल से सिंचित क्षेत्रों के खाद्य पदार्थों का सेवन कर सकते हैं अथवा जल विद्युत सयंत्र से उत्पन्न बिजली प्राप्त कर सकते हैं । नदी का जल बांधों के पीछे उठता है तथा कृत्रिम झीलों का निर्माण करता है, जो जलाशय कहलाते हैं । संचयन किए गए जल को विद्युत-निर्माण अथवा घरों तथा उद्योगों में जल की आपूर्ति सिंचाई अथवा नौवहन में उपयोग किया जा सकता है । जलाशय, मछली पकड़ने तथा खेलने के लिए भी अच्छे स्थान है
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बांधों के प्रकार

बांध के निर्माण तथा अभिकल्प में उपयोग की गई सामग्री के आधार पर बांध कई प्रकार के होते हैं । एक बांध द्वारा कितना पानी उठाया जाए तथा इसे कितना बड़ा एवं शक्तिशाली बनाया जाए, इसका पता लगाने के लिए अभियंताओं द्वारा माडलों तथा कम्प्यूटरों का उपयोग किया जाता है । तब वे निर्णय ले सकते है कि किस प्रकार के बांध का अभिकल्प किया जाए । बांध के प्रकार बनाए जाने वाले बांध के स्थान, सामग्री, तापमान, मौसम अवस्थाओं मिट्टी एवं चट्टान किस्म तथा बांध के आकार पर निर्भर करते हैं ।

गुरूत्व बांध कंक्रीट से बने बहुत बड़े एवं वजनदार बांध होते हैं । इस तरह के बांधों का निर्माण एक बड़ी नींव पर किया जाता है तथा इनके वजनदार होने से इन पर जल के वहाव का असर नहीं होता । गुरूत्व बांधों को केवल ताकतवर चट्टानी नींव पर ही बनाया जा सकता है । अधिकांश गुरूत्व बांधों का निर्माण महँगा होता है क्योंकि इनके लिए काफी कंक्रीट की आवश्यकता होती है । भाखड़ा बांध , कंक्रीट गुरूत्व बांध है ।

चाप बांध केन्यन की दीवारों की सहायता से बनाए जाते हैं । चाप बांध का निर्माण जल की ओर मुडी चाप की भांति किया जाता है । चाप बांध संकरी, चट्टानी स्थानों के लिए उत्तम है । चाप बांध को केवल संकरी केन्यन में ही बनाया जा सकता है जहाँ चट्टानी दीवारें कठोर एवं ढालुआँ होती है । बांध द्वारा धकेले जाने वाला जल बांध के लिए सहायता करता है । भारत में केवल इद्दूकी बांध ही एक चाप बांध है ।

तटबंध बांध प्रायः मिट्टी के बांध अथवा रॉकफिल बांध होते हैं । यह मिट्टी तथा चट्टान के बने विशाल आकार के बांध होते है जिसमें जल के तेज बहाव को रोक सकें । इनमें चट्टानों की दरारों से होने वाले जल के रिसाव को रोकने के लिए मिट्टी अथवा कंक्रीट की परत का इस्तेमाल किया जा सकता है । चूंकि मिट्टी कंक्रीट की भांति शक्तिशाली नहीं होती, मिट्टी के बांध आकार में काफी मोटे होते है । टीहरी बांध , रॉकफिल बांध का एक उदाहरण है ।
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बांध तथा जल विद्युत शक्ति

कुछ बांधों को विशेषतौर पर जल विद्युत जो जल द्वारा निर्मित विद्युत होती है, का निर्माण करने के लिए बनाया जाता है । इस किस्म की विद्युत कार्यशील, प्रदूषण-मुक्त तथा कम लागत की होती है । जल विद्युत सयंत्र घरो, स्कूलों, खेतों, फैक्टियों तथा व्यवसायों को उपयुक्त दर पर विद्युत मुहैया कराते हैं । जल को विशाल पाइपों के जरिए बांध में प्रायः उपलब्ध एक पावर हाऊस तक लाया जाता है । पावर हाऊस में जल की शक्ति टरबाईंनों को गोल-गोल धुमाती है तथा इस निरंतर गति से एक बल उत्पन्न होता है जिससे विद्युत-शक्ति का निर्माण किया जाता है । विद्युत सयंत्र में उत्पन्न विद्युत ऊर्जा बांध के पीछे के जल की स्थिजित ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तन के परिणामस्वरूप प्राप्त की जाती है । यह जल विद्युत शक्ति को तब संग्रहित करके घरों में वितरित किया जाता है जहाँ यह टीवी देखने, कम्प्यूटर पर खेलने, खाना बनाने इत्यादि के काम आती है । ऊपर जाएँ

जल विद्युत संयत्र छवि

जल विद्युत शक्ति कैसे निर्मित की जाती है ?

जल विद्युत संयत्र तेजी से प्रवाहित अथवा गिरते हुई जल की गतिज ऊर्जा से विद्युत उत्पन्न करने के लिए जल को एक उच्चतर स्तर एकत्र अथवा संग्रहित करके बड़े पाइपों ;जिन्हे पेनस्टॉक कहते हैं अथवा सुंरगों से नीचले स्तर पर भेजा जाता है । गिरता हुए जल की सहायता से टरवाईनों को चलाया जाता है । टरबाइनों की सहायता से जेनेरेटरों को क्रमशः चलाया जाता है जिनमें एक आर्मेचर तार एक शक्तिशाली चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न करती है । इससे टरबाइन की यांत्रिक ऊर्जा विद्युत में परिवर्तित होती है । टांस्फारमर द्वारा जेनेरेटरों में उत्पन्न प्रत्यावर्ती करंट को उच्च वोलटेज करंट में परिवर्तित किया जाता है जो दूरस्थ पारगमन के लिए उचित होता है । एक संरचना जिसमें टरबाइनों तथा जेनेरेटरों को रखा तथा पाइपों अथवा पेनस्टॉकों को लगाया जाता है उसे पावरहाऊस कहते हैं ।
    जल विद्युत शक्ति के अन्य स्रोतो की तुलना में कई लाभ होते हैं जैसे जल विद्युत चक्र की बार-बार होने वाली प्रकृति के कारण इसे लगातार पुनचक्रित किया जा सकता है, तथा इसे न तो उष्मीय और ना ही विविक्त प्रदूषण होता है । जल से विद्युत उत्पन्न करने के बार इसका उपयोग सिंचाई तथा पीने के लिए किया जा सकता है । तथापि, जल विद्युत सयंत्रों का निर्माण कुछ सीमित स्थानों पर ही किया जा सकता है क्योंकि इसके लिए बड़ी मात्रा में निवेश तथा समय की आवश्यकता होती है । इनके लिए बड़े क्षेत्र को जलमग्न करने की आवश्यकता होती है । जिससे सामाजिक तथा पर्यावरणीय समस्याओं का सामना करना पड़ता है । सरकार उन ग्रामीणों का पुनर्वास करती है जिनकी भूमि को जलमग्न किया जाता है ।
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बाढ़ क्या हैं?

बाढ़ प्राकृतिक आपदाएँ हैं जो आमतौर पर तीव्र वर्षा के कारण होती हैं जो नदी की एक सामान्य धारण क्षमता से अधिक अपवाह का उत्पादन करती हैं। इससे नदियाँ अपने बैंकों को उखाड़ फेंकती हैं और मैदानी इलाकों को भर देती हैं। बाढ़ कुछ घंटों से लेकर कुछ दिनों तक रह सकती है, लेकिन जान, माल और फसलों को व्यापक नुकसान पहुंचाती है।

बाढ़ विभिन्न घटनाओं के कारण हो सकती है जैसे:

  1. कई दिनों तक लंबी बारिश
  2. थोड़े समय में भारी वर्षा। इस घटना के कारण बाढ़ आती है।
  3. कभी-कभी एक भूस्खलन नदी या धारा को अवरुद्ध करता है और इसे अतिप्रवाह का कारण बनता है
  4. जब बाँध फेल होते हैं तो नदियाँ भी बाढ़ आ सकती हैं

सुरक्षा

  1. 1. तूफान अपवाह को संग्रहीत करने और बाढ़ के बहाव को कम करने के लिए कई नदियों और नदियों पर बाढ़-नियंत्रण बांध बनाए गए हैं। यह अस्थायी रूप से तूफान के अपवाह को रोककर और नदी के स्तर में गिरावट आने पर मध्यम रूप से होने वाले क्षारों में जारी करके किया जाता है।
  2. 2. लेवेस कृत्रिम नदी तट हैं जो बाढ़ के पानी के प्रसार को नियंत्रित करने और बाढ़ से आच्छादित भूमि की मात्रा को सीमित करने के लिए बनाए गए हैं। ऊपर जाएँ

सूखा क्या है

सूखा महीनों या वर्षों की एक विस्तारित अवधि है जब कोई क्षेत्र अपने पानी की आपूर्ति में कमी को नोट करता है। आम तौर पर, यह तब होता है जब एक क्षेत्र औसत वर्षा से नीचे लगातार प्राप्त करता है। कोई स्पष्ट कट सीमांकन नहीं है जो सूखे को परिभाषित कर सकता है। सूखा तीन प्रकार का हो सकता है: -

(i) 1. मौसम संबंधी सूखा: यह तब होता है जब किसी क्षेत्र में वास्तविक वर्षा उस क्षेत्र के मौसम विज्ञान से काफी कम होती है। छोटे क्षेत्रों के लिए वर्षा श्रेणियों को एक मौसम विज्ञान क्षेत्र की सामान्य वर्षा से उनके विचलन द्वारा परिभाषित किया जाता है –

अतिरिक्त: सामान्य से 20 प्रतिशत या अधिक
सामान्य: 19 फीसदी ऊपर सामान्य - 19 फीसदी सामान्य से नीचे
कमी: सामान्य से 20 प्रतिशत नीचे - सामान्य से 59 प्रतिशत कम
Scanty: सामान्य से 60 फीसदी या अधिक नीचे
पूरे देश में एक सामान्य मानसून हो सकता है, लेकिन विभिन्न मौसम विज्ञान जिलों और उप-विभाजनों में सामान्य से नीचे वर्षा हो सकती है।.

(ii)हाइड्रोलॉजिकल सूखा: सतही जल की एक कमी के कारण बहुत कम जल प्रवाह और झीलों, नदियों और जलाशयों का सूखना

(iii) कृषि सूखा: अपर्याप्त मिट्टी की नमी जिसके परिणामस्वरूप तीव्र फसल तनाव और कृषि उत्पादकता में गिरावट आती है

अखिल भारतीय सूखे के पहले के वर्षों 1987, 1979, 1972

सूखे की अवधि में महत्वपूर्ण पर्यावरणीय, आर्थिक और सामाजिक परिणाम हो सकते हैं। सबसे आम परिणामों में शामिल हैं:

  • पशुओं की मौत।
  • कम हुई फसल की पैदावार।
  • घरेलू और औद्योगिक उपयोगकर्ताओं के लिए पानी की कमी।
  • कुपोषण, निर्जलीकरण और संबंधित रोग।
  • सिंचाई के लिए पानी की कमी के कारण अकाल। ऊपर जाएँ